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बालकृष्ण को छोटा भाई मानती हूं भक्ति किरण शास्त्री जन्मदिवस पर उनके व्यक्तित्व एवं कथा वाचन की विशेषता उजागर।

वाराणसी (यूपी) । वाराणसी निवासी संस्कृत महाविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्रधानाचार्य सह देशव्यापी धर्म- ग्रंथों के प्रसिद्ध कथावाचक डाॅ• अखिलानंद शास्त्री की चार सुपुत्रियों में सब से छोटी साध्वी भक्तिकिरण शास्त्री का जन्म उदीयमान सूर्य की षष्ठी-पूजा के दिन देर रात्रि में होना उनके दिव्य ज्ञान एवं माता काली को समर्पित आध्यात्मिक व्यक्तित्व का द्योतक है। माता-पिता की संतान चार पुत्रियां ही होने के कारण वे बाल कृष्ण को अपना छोटा भाई कहती हैं। यह भी कि एकांतिक ध्यान की विशेष अवधि में अनुज कृष्ण से उनका संवाद होता है।
मां काली की परम भक्त साध्वी भक्तिकिरण शास्त्री ने सन् 1963 ईस्वी में मुद्गल ऋषि को तपोभूमि मुंगेर में गुरू परमहंस शिवानंद सरस्वती की प्रेरणा से परमहंस सत्यानंद सरस्वती की पहल पर स्थापित प्रथम आधुनिक योग विश्वविद्यालय “बिहार योग भारती ” के गुरुकुल आश्रम में छात्रा जीवन में ही पिता श्री डाॅ• अखिलानंद शास्त्री के सानिध्य में श्रीमदभागवत् पुराण का सुमधुर कंठ से कथावाचन करने वाली डाॅ• भक्तिकिरण शास्त्री ने न सिर्फ वाराणसी के विश्वविख्यात संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से सर्वोच्च अंकों के साथ एम• ए• फिर पी• एच•डी• की उपाधि प्राप्त की, बल्कि स्नातक की पढ़ाई करने के दिनों से ही देश के कई राज्यों में स्वतंत्र रूप से अनेक धर्मग्रंथों पर आज तक कथा एवं भजन कार्यक्रम करती आ रही हैं।
परमहंस सत्यानंद सरस्वती के आशीर्वाद और मार्गदर्शन में विदेशों से मुंगेर ( विभिन्न अवसरों पर) आये विदेशियों के लिए साध्वी भक्तिकिरण कथाक्रम में बीच बीच में अंग्रेजी कथा सुनाने लगीं। मुंगेर के ‘गंगादर्शन’ के अतिरिक्त सत्यानंद सरस्वती के रिखिया (झारखंड स्थित) सेवाश्रम में भी अपने कथाज्ञान की अजस्त्र धारा प्रवाहित कर इस दैवी-वरदान से श्रोताओं को चमत्कृत किया है। पंडितों एवं कथा-वाचकों के गढ़ बनारस के हिन्दू विश्वविद्यालय तथा प्रस्तर- निर्मित प्रसिद्ध ‘ पंच मंदिर ‘ में भी विद्वानों और धर्माचार्यों के बीच सप्रसंग व्याख्या करती हुई कथामृत का पान कराया है। भक्त जन इनके चरणों में लाखों रुपये न्योछावर कर देते हैं। जिसका उपयोग ये विंध्याचल में विहत् काली मंदिर, संस्कृत में उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों तथा वृद्धाश्रम को मदद के रूप में करती हैं। सादगी, सरलता, मृदुभाषी एवं गंभीर स्वभाव की भक्तिकिरण शास्त्री को अहंकार छू भी नहीं सका है। कामरूप कामख्या में मां काली की योनी- शक्ति की दिव्यता और समस्त ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारणस्वरुप उन्हें अनुभव कर गृहस्थ जीवन बिताने की बजाय भारतीय धर्मग्रंथों के माध्यम से देशवासियों की चेतना को आजीवन ईश्वर की ओर उन्मुख करने का संकल्प लिया।
बिहार योग भारती (गंगा-दर्शन) के प्रधान स्वामी निरंजनानंद सरस्वती से दीक्षा-प्राप्त कर साध्वी भक्तिकिरण ने उनके उस संदेश को आत्मसात किया- गृहस्थ आश्रम में रहता हुआ मनुष्य संन्यासी जीवन जी सकता है, जो वे अपने प्रवचनों में कहते आ रहे हैं। पिताश्री के कथा सुनाने के आकर्षक कौशल की स्वामिनी बनी कनिष्ठ सुपुत्री आज उच्च संस्कार पा रहे आभायुक्त एक बालक की माता हैं। भारतवासियों की आत्मा को परमात्मा की ओर ले चलने का उनका दिव्य संधान स्तुत्य है। उनका पावन जन्मदिवस विश्व का आलोक-पथ बने। समाचार के साथ वाराणसी के पंच मंदिर में देवी पुराण पर प्रवचन करती भक्ति किरण, मुंगेर के योगासन में कथा सुनते श्रद्धालु , बिहार योग भारती संस्थान की फोटो संलग्न।

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